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साक्षरता अनिवार्य है । साक्षरता का प्रसार शिक्षा के सार्वजनिकरण रो ही हो सकता है। (2) व्यक्ति का विकास – शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति का सर्वागीण शारीरिक, मानसिक
एवं आध्यात्मिक विकास है । शिक्षित व्यक्ति की विचारधारा निरक्षर व्यक्ति से भिन्न होती है । निरक्षर व्यक्ति का क्षेत्र संकुचित होता है तथा शिक्षित व्यक्ति व्यापक दृष्टिकोण रखता है । वह स्वयं को उन्नति के साथ-साथ समाज एक राष्ट्रीय उन्नति
में भी योगदान करता है ।। (3) सामाजिक विकास – किसी समाज का मूल्यांकन उसके सदस्यों की शिक्षा से किया जा
सकता है । शिक्षित समाज दूत गति से विकास करता है । वह परम्परा, रूढ़िवाद, अंधविश्वासों से परे रहता है तथा विज्ञान एवं तकनीकी विकास का लाभ उठाकर सामाजिक विकास में योग देता है ।।
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(4) लोकतंत्र की सफलता – भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाधी के शब्दों में
लोकतंत्र के सफल संचालन हेतु शिक्षा (साक्षरता) अनिवार्य शर्त हैं उसी देश में प्रजातंत्र सफल हो सकता है, जिस देश के नागरिक शिक्षित हो । अशिक्षा के कारण भारत में जातिवाद, भाषावाद प्रान्तीयवाद साम्प्रदायिकता, क्षेत्रीयता आदि की विकराल समस्याएँ है।
जिनसे भारत प्रगति नही कर पा रहा है । (5) व्यावसायिक सफलता – वर्तमान युग विज्ञान का युग है । प्रत्येक व्यवसाय तकनीक पर
आधारित है । शिक्षित व्यक्ति वर्तमान विज्ञान एवं तकनीकी पहलुओं को समझ कर
व्यावसायिक सफलता प्राप्त कर सकता है । (6) राष्ट्रीय विकास – शिक्षित नागरिक राष्ट्रीय विकास की सुदृढ कडी होती है । शिक्षित
व्यक्ति राष्ट्रीय विकास के लिए स्वार्थ की तिलांजली दे देता है, तथा बड़े से बड़ा
बलिदान करने की भावना भी रखता है ।। (7) दैनिक जीवन की सफलता हेतु – आज विज्ञान एवं तकनीक पर आधारित जीवन के
प्रत्येक क्षेत्र में, उपकरणों का बोलबाला है । इन उपकरणों की जानकारी, आवश्यक होती है शिक्षित व्यक्ति आवश्यकता पड़ने पर छोटी-छोटी समस्याओं को सरलता से दूर कर
दैनिक जीवन को सफल कर सकता है ।। (8) अन्तराष्ट्रीय सद्भाव हेतु – संचार एवं आवागमन के दुतग्रामी साधनों ने सम्पूर्ण विश्व
को घर आगन जैसा बना दिया है । आज आत्म निर्भरता के स्थान पर पारस्परिक अंत: निर्भरता है । एक देश अपनी आवश्यकता दूसरे देश से पूर्ण करता है । स्पष्टतः आज विज्ञान ने इतने सहारक अस्त्र बना दिये है कि अणु आयुधों के प्रयोग से क्षण मात्र में पृथ्वी का मानचित्र बदला जा सकता है । शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास आदि पारस्परिक सद्भाव का ही परिणाम है । अतः सार्वजनिक शिक्षा से अर्नाराष्ट्रिय सद्भाव में
वृद्धि होती है | (9) उच्च शिक्षा की तैयारी – अनिवार्य एवं निशुल्क शिक्षा के परिणामस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति
साक्षर तो होगा ही उसमें शिक्षा के प्रति लगाव भी उत्पन्न होगा | वह रूचि के अनुसार, धार्मिक, साहित्यिक, भाषा, यात्रा, खोज सम्बन्धी साहित्य का अध्ययन करने का प्रयत्न करेगा । फलतः: उसमें उच्च शिक्षा प्राप्त करने की क्षमता जागत होगी । शिक्षा विकास का मार्ग प्रशस्त करती है । उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति स्वयं का, समाज
का राष्ट्र का विकास करने की बात सोचेगा और सहायक होगा । सार्वजनिक शिक्षा के उद्देश्य | 1 देश के 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के सभी बच्चों को कक्षा 1 से 9 तक की निःशुल्क
और अनिवार्य शिक्षा की वर्ष 2010 तक समुचित व्यवस्था करना । 2 वर्ष 2010 की समाप्ति तक इन सभी बालकों को उपयोगी एवं समुचित गुणवता और
संस्कार युक्त शिक्षा प्रदान करना । 3 वर्ष 2010 तक प्रत्येक दशा में बालक और बालिकाओं में शैक्षिक असमानता और
सामाजिक भेदभाव मिटाने के लिए सभी व्यवस्थाएं समुचित करना ।
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4 6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को 8 वर्ष तक की उच्च प्राथमिक स्तर | तक की शिक्षा पूर्ण करना । 5 प्राथमिक स्तर पर सभी बच्चों को जीवनोपयोगी और समाजोपयोगी समुचित गुणस्तर
की शिक्षा व्यवस्था किया जाना ।। 6 प्राथमिक शिक्षा के मौजूद ढांचे का समुचित प्रकार से उपयोग करते हुए इस अभियान
के माध्यम से शिक्षा सम्बन्धी सभी प्रयासों को एक सूत्र में बांधते हुए इसे अधिक
क्रियाशील बनाना । 11.5 शिक्षा के सार्वजनिकरण में असफलता के कारण।
शिक्षा के सार्वजनिकरण में बाधक तत्व या कारण
आर्थिक तत्व
शैक्षिक तत्व
सामाजिक तत्व
अध्यापकों की न्यनता विद्यालय का नीरस | निजीव शिक्षण
वातावरण
विधियां
अधूरे विद्यालय
एकल अध्यापक विद्यालय
अव्यावहारिक दोषपूर्ण परीक्षा पाठ्यक्रम प्रणाली
पक्षपात ।
नकारात्मक अभिवृति बाल विवाह परम्पराएं प्रदाप्रथा विद्यालय
पाठ्यक्रम प्रणाली जाति लिंग सार्वजनिकरण में निम्नलिखित कठिनाईयों के कारण सफल विकास नही हो पा रहा है । (1) शासकीय नीति अव्यावहारिक – भारत सरकार के सामने शिक्षा से सम्बन्धित दो प्रमुख
समस्याएँ थी । एक तो 6 से 14 वर्ष तक के बालकों के लिए अनिवार्य एवं निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करना, दूसरी सामान्य विद्यालयों को बुनियादी विद्यालयों में बदलना। पंचवर्षीय योजनाओं की नीतियाँ इतनी अव्यवहारिक रही है कि सरकार उसमें पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर सकी । इस समय देश की राजनैतिक और आर्थिक स्थिति भी अनूकूल नही थी । इसलिए ये योजनाएँ व्यावहारिक नहीं बन सकी और
सार्वजनिक शिक्षा-विकास की गति धीमी हो गई ।। (2) योग्य शिक्षकों की कमी – शिक्षकों के अभाव के कारण भी शिक्षा के सार्वजनिकरण की
योजना पूरी नहीं हो सकी । प्रशिक्षण सुविधाओं का अभाव रहा तथा अध्यापकों का वेतन कम होने से लोग इस व्यवसाय में आना पसंद नही करते थे, नगरों में तो फिर भी शिक्षकों का इतना अभाव नही रहता, किन्तु ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों की भारी कमी रहती है । अध्यापिकाओं के सम्बन्ध में तो विशेष रूप से यह बात पाई
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जाती है असुविधाओं के कारण अध्यापिकाएँ गाँवों में नही रूक सकती । यह समस्या
आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में उपस्थित है ।। (3) शिक्षण स्तर का अनुपयुक्त होना – आर्थिक समस्या के कारण शिक्षण सामग्रियाँ भी
ठीक से उपलब्ध नहीं है । इसलिए शिक्षण स्तर में सुधार नही हो पाता । योग्य शिक्षकों के अभाव के कारण प्राथमिक शिक्षा में प्रगति नही हो सकी । इन शिक्षकों
की स्थिति ठीक न होने से शिक्षा स्तर में गिरावट आती जा रही है । (4) पाठ्यक्रम का दूषित होना – पाठ्यक्रम में बुनियादी पाठ्यक्रम का पूर्ण अभाव है ।
जिससे पाठ्यक्रम उपयोगी और व्यावहारिक नही बन पाया है । विद्यालयों का पाठ्यक्रम संकीर्ण, अनुपयोगी और पुस्तकीय होने से बालकों का शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकार। ठीक नही हो पाता बालकों में सृजनात्मक प्रवृत्ति, रचनात्मक

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