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लिए स्पष्ट मापदण्ड निर्धारित करना चाहिए । 4. अध्ययन के प्रत्येक विषय के लिए एकाकी पाठ्य-पुस्तक निर्धारित नहीं होनी चाहिए
वरन् उचित संख्या में पुस्तकें, जो निर्धारित स्तर को पूरा करती हों, संबंधित स्कूलों को
चयन करने के लिए छोड़ देने की संस्तुति होनी चाहिए । 5. अध्ययन के लिए निर्धारित पुस्तकों एवं पाठ्यपुस्तकों में बार-बार परिवर्तन नहीं होना
चाहिए | 6. विषय विशेषज्ञ लेखकों को पाठ्यपुस्तकें अथवा अन्य सहायक पुस्तकें लिखने के लिए | आमंत्रित करना।
7. अन्य प्रदेशों के साथ सम्पर्क करके क्षेत्रीय भाषाओं की अच्छी पुस्तकों का चयन करना। 15.9.4 गतिशील शिक्षण पद्धतियाँ
आयोग ने शिक्षण विधियों के लक्ष्य इस प्रकार बताये हैं1. कार्य के लिए प्रेम उत्पन्न करना । 2. ज्ञान की प्राप्ति । 3. स्पष्ट चिन्तन शक्ति का विकास करना । 4. छात्रों की रूचि का विस्तार करना ।
गतिशील शिक्षण पद्धति अध्यापकों एवं शिष्यों को जोड़ती है । इससे छात्रों का मस्तिष्क प्रभावित होता है तथा उनके व्यक्तित्व के विकास में बहुत सहायक सिद्ध होती है । शिक्षण पद्धति छात्रों के कार्य एवं मूल्यों के स्तर का निर्धारण करती है एवं उनके भावात्मक एवं बौद्धिक साधनों, मनोवृतियों एवं मूल्यों को प्रभावित करती है । अच्छी शिक्षण विधियाँ वही हो सकती है। जो वे सक्रिय और स्फूर्तिपूर्ण हो । आयोग ने शिक्षण विधियों पर प्रकाश डालते हुए लिखा है
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1. विद्यालयों में शिक्षण विधियों का उद्देश्य छात्रों में उपयुक्ता मूल्यों, उचित दृष्टिकोण
और कार्य करने की आदतों का विकास करना चाहिए | 2. शिक्षण विधियों को छात्रों को सीखने और प्राप्त किये गये ज्ञान के आधार पर प्रयोग
करने का अवसर देना चाहिए । 3. विभिन्न प्रकार के अभिव्यक्ति कार्यों को विद्यालय में महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना
चाहिए | 4. शिक्षण विधियाँ छात्र में कार्य के प्रति प्रेम, कुशलता, ईमानदारी तथा पूर्ण रूप से प्रबल
इच्छा उत्पन्न करती है ।। 5. शिक्षण में कंठस्त करने की क्रिया पर बल नहीं दिया जाना चाहिए । 6. शिक्षण ऐसी परिस्थिति के माध्यम से किया जाना चाहिए जो मूर्त और वास्तविक हो ।
इनका उद्देश्य क्रियापद्धति और योजना पद्धति के द्वारा होना चाहिए । 7. शिक्षण विधियाँ छात्रों के वैयक्तिक विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर प्रयोग में लानी
चाहिए |
आयोग ने शिक्षण-विधियों से सम्बन्धित सुझाव अपने द्वारा प्रस्तावित पाठ्यक्रम की सफलता के लिए दिये । आयोग ने जो पाठ्यक्रम निर्धारित किया है, वह सैद्धान्तिक संकुचित और परम्परागत नहीं है । अत: इस पाठ्यक्रम को सफल बनाने के लिए गतिशील शिक्षण विधियों की आवश्यकता है । 15.9.5 विद्यालय में पुस्तकालय का स्थान
माध्यमिक शिक्षा आयोग ने पुस्तकालय की महता शिक्षा-शिक्षण में सर्वाधिक स्वीकार की है । 1. पुस्तकालय को विद्यालय की बौद्धिक प्रयोगशाला का रूप दिया जाए और उसे
व्यक्तिगत एवं सामूहिक कार्यों की योजनाओं, साहित्यिक, रूचियों और पाठ्यक्रम | सहगामी क्रियाओं को पूर्ण करने में सहायक बनाया जाए । 2. प्रगतिशील शिक्षण-विधियों को प्रयोग में लाने के लिये पुस्तकालय को एक आवश्यक
साधन माना जाए । 3. पुस्तकालय को विद्यालय का सबसे अधिक आकर्षक स्थान बनाया जाए, जिससे छात्र
स्वयं उसकी ओर आकर्षित हो । 4. प्रत्येक माध्यमिक विद्यालय में एक प्रशिक्षित पुस्तकालयाध्यक्ष की नियुक्ति की जाए । 5. प्रत्येक विद्यालय में सामान्य पुस्तकालय के अतिरिक्त कक्षा-पुस्तकालयों और विषय
पुस्तकालयो की भी व्यवस्था की जाए । 6. सार्वजनिक पुस्तकालयों में बालकों और किशोरों के लिए उपुयक्त पुस्तकों का एक पृथक
खण्ड रखा जाय । इन पुस्तकालयों द्वारा स्थानीय विद्यालयों के पुस्तकालयों की कमी | को पूरा किया जाए । 7. यथासम्भव विद्यालयों के पुस्तकालयों को गर्मियों और अन्य छुट्टियों में खुला रखा जाए
जिससे छात्र और स्थानीय समाज के लोग उनका अधिकाधिक उपयोग कर सकें ।
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आयोग ने माध्यमिक स्कूलों में पुस्तकालय को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया है परन्तु इसके विपरीत अधिकांश पुस्तकालयो की स्थिति बहुत शोचनीय है । वास्तविकता यह है। कि पुस्तकालय, विद्यालय की रीढ़ है । पुस्तकालय का उपयोग केवल छात्रों के लिए ही
नहीं अपितु समाज के लिए भी होना आवश्यक है । 15.9.6 चरित्र निर्माण की शिक्षा
आयोग ने चरित्र निर्माण की शिक्षा पर बहुत बल दिया और इस सम्बन्ध में निम्नलिखित सुझाव दिए1. छात्रों के चरित्र का निर्माण करना सभी अध्यापकों का विशेष उतरदायित्व है । अत:
स्कूल के प्रत्येक कार्यक्रम द्वारा चरित्र निर्माण की शिक्षा दी जाए । 2. विद्यालय कार्य को ऐसे ढंग से संगठित किया जाए । जिससे छात्र प्रत्येक कार्य को
कुशलता, ईमानदारी, अनुशासन, सहयोग और अच्छे स्वभाव से पूरा करें । 3. विद्यालय विस्तृत समाज में एक लघु समाज है । अत: राष्ट्रीय जीवन में जिन
दृष्टिकोणों मूल्यों और आचरण के ढंगों का महत्व है, उनको विद्यालय जीवन में
अवश्य प्रतिबिम्बित किया जाए । 4. चरित्र-निर्माण की शिक्षा के लिए विद्यालय द्वारा अभिभावकों और समाज दोनों का
सक्रिय सहयोग प्राप्त किया जाए । 5. उत्तम अनुशासन के लिए आवश्यक है कि शिक्षकों और छात्रों में घनिष्ठ सम्पर्क
स्थापित किया जाए । 6. विद्यालयों को ‘आचरण संहिता बनाने और उसका पालन करने के लिए उतरदायी
बनाया जाए । 7. विदयालय में स्वशासन को स्थान दिया जाए | स्वशासन हाउस प्रणाली के रूप में
संचालित किया जाए । 8. राजनैतिक खेलों और पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं को प्रोत्साहित किया जाए और उनकी
शैक्षिक संभावनाओं को खोजकर उनसे अधिक से अधिक लाभ कमाया जाए । 9. राजनैतिक चुनावों और प्रचार कार्यों में लगभग 17 वर्ष से कम आयु के छात्रों का | उपयोग न किया जाए | एक कानून बनाकर इसको दण्डनीय अपराध घोषित किया
जाए। 10. केन्द्रीय सरकार द्वारा एन.सी.सी. की उपयुक्त व्यवस्था की जाए और उसके विस्तार
का दायित्व अपने ऊपर लिया जाए । 11. विद्यालयों में छात्रों को धार्मिक और नैतिक शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करती है ।
चरित्र प्रत्येक व्यक्ति की सबसे मूल्यवान निधि है । अच्छा चरित्र उसे ऊपर उठाता है। । आयोग ने चरित्र निर्माण हेतु अच्छे सुझाव दिये है । उसने ‘आचरण संहिता’ अतिरिक्त पाठ्यक्रियाओं एन.सी.सी. आदि पर विशेष बल दिया है । हमें इन सभी सुझावों के अनुसार कार्य करके अपने छात्रों के चरित्र का निर्माण करना चाहिए, जिससे वे भविष्य में ऐसे चरित्रवान नगारिक बनें जिन पर हमारा देश गर्व कर सके ।
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15.9.7 माध्यमिक विद्यालयों में मार्गदर्शन एवं निर्देशन
आयोग ने इरा स्तर पर मार्गदर्शन और निर्देशन कार्यक्रम के विभिन्न पहलुओं पर इस प्रकार विचार व्यक्त किया है1. शिक्षा के अधिकारियों द्वारा छात्रों के शैक्षिक मार्गदर्शन पर अधिक ध्यान दिया जाना
चाहिए । 2. विद्यालय में प्रशिक्षित ‘मार्गदर्शन अधिकारियों की नियुक्ति की जाए । । आयोग के मार्गदर्शन और निर्देशन सम्बन्धी सुझाव भारत के लिए नये है । अमेरिका में इन बातों पर बहुत अधिक ध्यान दिया जाता है । बालक और बालिकाओं को अपनी भावों शिक्षा और व्यवसाय के बारे में पूरी सहायता दी जाती है । भारत में भी इसकी आवश्यकता है।

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