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। मनोविज्ञान को अग्रेजी में Psychology कहते है । इस शब्द की उत्पत्ति यूनानी भाषा के दो शब्द ‘साइकी’ (Psyche) तथा लोगस (Logo) से मिलकर हुई है । साइकी शब्द का अर्थ है कि आत्मा है जबकि लोगस शब्द का अर्थ-अध्ययन | अतः अंग्रेजी शब्द Psychology का अर्थ है आत्मा का अध्ययन । परन्तु वर्तमान समय में मनोविज्ञान व साइकोलोजी के शाब्दिक अर्थों को स्वीकार नहीं किया जाता है । अब यह एक स्वतन्त्र विषय के रुप में स्वीकार किया गया है । मनोविज्ञान के आधुनिक अर्थ को समझने के लिये मनोविज्ञान की परिभाषाओं के ऐतिहासिक विकास क्रम को समझना आवश्यक है । मनोविज्ञान के अर्थ में क्या क्या परिवर्तन हुये इसको संक्षेप में इस प्रकार समझाया जा सकता है1.3.1 आत्मा के विज्ञान के रुप में मनोविज्ञान
मनोविज्ञान दर्शनशास्त्र की वह शाखा है जिसमें आत्मा का अध्ययन किया जाता है । प्लेटो (Plato), अरस्तू (Aristotle) डेकार्ट (Decarte) आदि यूनानी दार्शनिकों ने मनोविज्ञान को आत्मा के विज्ञान (Science of Soul) के रुप में स्वीकार किया है । यह परिभाषा 16 वीं
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शताब्दी तक प्रचलित रही परन्तु बाद में आत्मा की प्रकृति के संबंध में तरह-तरह की शंकाएं उत्पन्न होने लगी तथा तत्कालीन मनोवैज्ञानिक आत्मा की स्पष्ट परिभाषा उसके स्वरूप, रंग रुप व आकार, स्थिति, अध्ययन की विधियों को स्पष्ट करने में असफल रहे अतः परिणाम स्वरूप परिभाषा को अस्वीकार कर दिया गया । 1.3.2 मन के विज्ञान के रुप में मनोविज्ञान ।
मध्य युग के दार्शनिकों ने मनोविज्ञान को मन के विज्ञान (Science of mind) के रुप में परिभाषित किया । इन्होंने मनोविज्ञान को अध्ययन का वह क्षेत्र स्वीकारा जिसके अन्तर्गत मस्तिष्क या मन का अध्ययन किया जाता है । मन की प्रकृति तथा स्वरुप को स्पष्ट रुप से निर्धारित करने में मनोवैज्ञानिक असफल रहे अतः मनोविज्ञान की यह परिभाषा भी शीघ्र ही अमान्य हो गई । 1.3.3 चेतना के विज्ञान के रुप में मनोविज्ञान
| कुछ मनोवैज्ञानिकों के द्वारा मनोविज्ञान को चेतना का विज्ञान (Science of Consciousness) के रुप में व्यक्त किया गया । वाइव (Vive) विलियम जेम्स (William James Suly) विलियम बुड (Wiliam Woundt) आदि विद्वानों ने इसे चेतना के विज्ञान के रुप में स्वीकारा और कहा कि मनोविज्ञान केवल क्रियाओं का अध्ययन करता है परन्तु मनोवैज्ञानिक चेतन शब्द के अर्थ व स्वरूप के सम्बन्ध में एक मत न हो सके । चेतन क्रियाओं पर अर्द्ध चेतन व अचेतन क्रियाओं का प्रभाव भी होने के स्पष्ट प्रमाणों के कारण मनोवैज्ञानिकों की इस परिभाषा पर भी मनोवैज्ञानिक में मतभेद रहा तथा इसे मनोविज्ञान की अपूर्ण परिभाषा माना गया । 1.3.4 व्यवहार के विज्ञान के रुप में मनोविज्ञान
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मनोविज्ञान को व्यवहार के विज्ञान (Science of Behavior) के रुप में स्वीकार किया जाने लगा | वाटसन्, (Wostson) वुडवर्थ (Woodworth) स्किनर, आदि मनोवैज्ञानिकों ने मनोविज्ञान को व्यवहार के एक निश्चित विज्ञान के रुप में स्वीकार किया । वर्तमान समय में मनोविज्ञान की इस परिभाषा को एक सर्वमान्य परिभाषा के रुप में स्वीकार किया जाता है । अतः मनोविज्ञान व्यवहार का अध्ययन करता है, और मनुष्य प्राणी जो कुछ प्रतिक्रिया करता है वह उसका व्यवहार है । मनोविज्ञान के अन्तर्गत शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक सभी प्रकार के व्यवहार का अध्ययन समाहित रहता है ।। 1.4 मनोविज्ञान व शिक्षा में सम्बन्ध
शिक्षा मनुष्य के ज्ञान, कला, कौशल में वृद्धि और उसके व्यवहार में परिवर्तन करने की प्रक्रिया है और मनोविज्ञान मनुष्य के व्यवहार के कारक, प्रेरक एवं नियन्त्रक तत्वों के अध्ययन का विज्ञान है । अतः स्पष्ट है कि इन दोनों का सम्बन्ध मनुष्य के व्यवहार से है । अतः इन दोनों में निकट सम्बन्ध होना चाहिए । शिक्षा मनुष्य में वांछित परिवर्तन करने की प्रक्रिया है। मनोविज्ञान यह बताता है कि यह परिवर्तन कब, कितना, और कैसे किया जा सकता है । दूसरी और शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में निरन्तर विकास करती है और यह चक्र चलता रहता है ।
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1.5 मनोविज्ञान का शिक्षा पर प्रभाव ।
मनोविज्ञान ने शिक्षा के सम्प्रत्यय, उद्देश्य, पाठ्यचर्या, एवं शिक्षण विधियों आदि को प्रभावित किया हैं | यह शिक्षा की सभी समस्याओं का समाधान मानव व्यवहार के आधार पर करता है । इसके अध्ययन क्षेत्र और विषय वस्तु को निम्नलिखित रुप में अभिव्यक्त कर सकते है :1.5.1 मनोविज्ञान और शिक्षा का सम्प्रत्यय
मनोविज्ञान में स्पष्ट किया है कि शिक्षा ज्ञान के विकास और मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन करने का साधन है । अतः शिक्षा मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन करने का साधन मानी जाती है। 1.5.2 मनोविज्ञान और शिक्षा के उद्देश्य
मनोविज्ञान शिक्षा के उद्देश्यों को निश्चित करने में तो कोई प्रभाव नहीं डालता परन्तु यह दार्शनिकों, समाजशास्त्रियों, राजनीति शास्त्रियों अर्थशास्त्रियों द्वारा निश्चित शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने की सम्भावनाएं स्पष्ट करता है और यह स्पष्ट करता है कि शिक्षा के विकास स्तर पर कौन से उद्देश्य किस सीमा तक प्राप्त किये जा सकते है । 1.5.3 मनोविज्ञान और शिक्षा का पाठ्यक्रम
मनोविज्ञान ने यह स्पष्ट किया है कि बालकों की शिक्षा उनकी जन्मजात शक्तियों और पर्यावरण इन दो तत्वों पर निर्भर करती है और यह जन्मजात शक्तियों, रुचियों एवं रुझानों की दृष्टि से भिन्न-भिन्न आयु वर्ग के बच्चों में भिन्न-भिन्न होती है और उनकी आवश्यकताओं में भी भिन्नता होती है इसलिये किसी भी स्तर की शिक्षा की पाठ्यचर्या का निर्माण उस स्तर के बच्चों की आयु, रुचि, रुझान एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर करना पड़ता है । 1.5.4 मनोविज्ञान और शिक्षण विधियाँ ।
मनोविज्ञान ने यह स्पष्ट किया है कि शिक्षा के द्वारा मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन होता है यह व्यवहार परिवर्तन की प्रकिया मनुष्य में जन्मजात शक्तियों एवं बाह्य पर्यावरण पर निर्भर करता है। अतः: किसी भी स्तर की बच्चों के शिक्षण विधियां उस स्तर के बच्चों की जन्मजात शक्तियों एवं रुचियों के आधार पर निर्मित होनी चाहिए । 1.5.5 मनोविज्ञान और अनुशासन
मनोविज्ञान ने मनुष्य की आंतरिक क्रियाओं को तीन भागों में विभाजित किया है – ज्ञानात्मक, भावात्मक मनोक्रियात्मक और यह भी स्पष्ट किया है कि उसका व्यवहार उसका ज्ञान एवं संवेगों पर आधारित होता है इसने यह भी स्पष्ट किया है कि मानव का संवेगात्मक विकास भय पूर्ण पर्यावरण में नहीं किया जा सकता है इसके लिये प्रेम एवं सहानुभूति पूर्ण पर्यावरण आवश्यक है । 1.5.6 मनोविज्ञान और शिक्षक
| मनोविज्ञान ने यह सिद्ध किया कि व्यक्ति की शिक्षा उसकी जन्मजात शक्तियों और पर्यावरण पर निर्भर करती है । शिक्षक ज्ञान प्राप्त करने के लिये उचित परिस्थिति एवं
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