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| विकास (Development) एवं अभिवृद्धि (Growth) कोई पृथक तथ्य नहीं है दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं ।
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2.2 अभिवृद्धि एवं विकास का अर्थ
अभिवृद्धि एवं विकास ये दोनों शब्द प्रायः बिना कोई भेदभाव किये पर्यायवाची रूप में काम में लाये जाते है । दोनों यह प्रकट करते है कि गर्भाधान के समय से किसी विशेष समय तक किसी प्राणी में कितना कुछ परिवर्तन आया हैं । इस तरह से अभिवृद्धि और विकास दोनों शब्दों का प्रयोग बालक में आयु के बढ़ने के साथ-साथ होने वाले परिवर्तनों के लिए किया जाता
। यहां पर हमने “अभिवृद्धि” (Growth) और “विकास” (Development) दो शब्दों का प्रयोग किया हैं । अभिवृद्धि का तात्पर्य केवल आकार बढ़ने में केवल शरीर की लम्बाई, चौड़ाई, भार में वृद्धि के साथ-साथ शरीर के विभिन्न बाह्य अंगो जैसे हाथ, पैर, धड़ और आन्तरिक अंगो जैसे हृदय, मस्तिष्क इत्यादि का बढ़ना शामिल हैं । इस अभिवृद्धि को विभिन्न प्रकार की इकाईयों (Units) में मापा जा सकता हैं ।।
। दूसरी ओर विकास का तात्पर्य शरीर के विभिन्न अंगो के रूप और परस्पर सम्बंध में परिवर्तन से है । विकास की प्रक्रिया विभिन्न अवस्थाओं में से गुजरती है जिससे उसका सम्पूर्ण विकास होता हैं । विकास से व्यवहार में परिपक्वता (Maturity) आती हैं । परिपक्वता का तात्पर्य उस अभिवृद्धि या विकास से है जो किसी अनर्जित व्यवहार के दिखायी देने से पहले आवश्यक होती है अथवा जिसके बाद ही किसी विशेष प्रकार का व्यवहार सीखा जा सकता हैं ।
। हालांकि अधिकांश लेखकों द्वारा दोनों शब्दों का प्रयोग साधारणतया एक ही अर्थ में किया जाता हैं । परन्तु अगर बारीकी से देखा जाए तो अभिवृद्धि एवं विकास के बीच कुछ अन्तर दिखलाई पड़ता हैं ।
हरलॉक के शब्दों में – “विकास अभिवृद्धि तक ही सीमित नही हैं । इसके बजाय, इसमें प्रौढ़ावस्था के लक्ष्य की ओर परिवर्तनों का प्रगतिशील क्रम निहित रहता हैं । विकास के परिणाम स्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएँ और नवीन योग्यताये प्रकट होती हैं ।” 2.3 अभिवृद्धि एवं विकास में अन्तर अभिवृद्धि (Growth)
विकास (Development) । अभिवृद्धि शब्द परिमाण सम्बंधी (Quantitive | विकास में ऐसे परिवर्तनों के लिए प्रयुक्त होता Changes) परिवर्तनों के लिए प्रयुक्त होता है | है जिससे बालक की कार्यक्षमता कार्यकुशलता | जैसे बच्चों के बड़े होने के साथ आकार | और व्यवहार में प्रगति होती हैं । लम्बाई, ऊँचाई, और भार आदि में होने वाले परिवर्तन को अभिवृद्धि कहते हैं । अभिवृद्धि, विकास रूपी सम्पूर्ण प्रक्रिया का एक | विकास शब्द अपने आप में एक विस्तृत अर्थ चरण है ।
रखता हैं । यह व्यक्ति में होने वाले सभी
परिवर्तनों को प्रकट करता हैं । अभिवृद्धि शब्द व्यक्ति के शरीर के किसी भी | विकास किसी एक अंग प्रत्यंग में अथवा अवयव तथा व्यवहार के किसी भी पहलू में | व्यवहार के किसी एक पहलू में होने वाले
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होने वाले परिवर्तनों को प्रकट कर सकता हैं ।। परिवर्तनों को नही बल्कि व्यक्ति में आने वाले
सम्पूर्ण परिवर्तनों को समुच्चय रूप में व्यक्त
करता हैं । अभिवृद्धि की क्रिया आजीवन नहीं चलती । | विकास एक सतत् प्रक्रिया (Continuous बालक द्वारा परिपक्वता ग्रहण करने पर यह | Process) हैं । समाप्त हो जाती हैं । अभिवृद्धि के फलस्वरूप होने वाले परिवर्तन | विकास शब्द कार्यक्षमता और व्यवहार में आने बिना कोई विशेष प्रयास किये दृष्टिगोचर हो | वाले गुणात्मक परिवर्तनों (Qualitative सकते है इन्हें भली भॉति मापा जा सकता हैं । | changes) को भी प्रकट करता है । इन
परिवर्तनों को प्रत्यक्ष रूप में मापना कठिन होता हैं । इन्हें केवल अप्रत्यक्ष तरीकों से मापा
जा सकता हैं । जैसे बालक के व्यवहार का
निरीक्षण करना इत्यादि। अभिवृद्धि के साथ-साथ सदैव विकास होना भी इसी प्रकार विकास भी अभिवृद्धि के बिना आवश्यक नहीं हैं । मोटापे के कारण एक | सम्भव हो सकता है । कई बार यह देखा बालक के भार में वृद्धि हो सकती है परन्तु इस जाता है कि कुछ बच्चों की ऊंचाई आकार एवं वृद्धि से उसकी कार्य क्षमता एवं कार्यकुशलता | भार में समय गुजरने के साथ-साथ कोई विशेष में कोई वृद्धि नही होती है । यानि अभिवृद्धि | परिवर्तन नही दिखाई देता परन्तु उनकी विकास को साथ लेकर नही चलती है। कार्यक्षमता तथा शारीरिक, मानसिक,
संवेगात्मक और सामाजिक योग्यता में बराबर
प्रगति होती रहती हैं। उपरोक्त वर्णित अन्तर के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि अभिवृद्धि एवं विकास में अन्तर हैं | 2.4 अभिवृद्धि की दशाएँ अभिवृद्धि निम्नलिखित दशाओं पर निर्भर करती है – 2.4.1 आनुवंशिकता –
बालक की अभिवृद्धि में सबसे अधिक महत्वपूर्ण कारक या दशा उसकी अनुवांशिकता हैं। मानव शिशु का लिंग, आकार, रंग, नाक, नक्शा, शीलगुण इत्यादि उसकी आनुवंशिकता पर निर्भर होते है । इसलिए भावी माता-पिता अपने स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान रखकर भावी सन्तति की आनुवंशिकता को प्रभावित करके उसकी अभिवृद्धि में योगदान दे सकते हैं । 2.4.2 भोजन –
गर्भावस्था में जीव माता से ही अपना भोजन प्राप्त करता है । इसलिए गर्भवती स्त्री को सन्तुलित भोजन (Balanced Diet) को ग्रहण करना चाहिए । जन्म के पश्चात् शिशु को माता का दूध दिया जाना चाहिए | उसके साथ शनैः शनैः सुपाच्य भोजन (Digestive Food) प्रदान किया जाना चाहिए ।
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किशोरावस्था में मानव प्राणी की सबसे अधिक अभिवृद्धि होती है अतः इस अवस्था में खान-पान पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए । 2.4.3 अन्त: स्त्रावी ग्रन्थियों के न्यासर्ग
बालक की शारीरिक और मानसिक बुद्धि में विभिन्न अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियों से निकलने वाले न्यास का बड़ा महत्त्वपूर्ण योगदान होता हैं । बालक की अभिवृद्धि पर पोष ग्रन्थि (Pituitary Gland) थॉयराइड ग्रन्थि , (Thyroid Gland), और यौन (Sex Gland) ग्रन्थियों के न्यास का विशेषरूप से प्रभाव पड़ता हैं । शरीर में इनकी कमी या अधिकता का प्रभाव शरीर के विकास पर पड़ता हैं । 2.4.4 व्यायाम –
अभिवृद्धि बालक की वृद्धि में विभिन्न प्रकार के खेलों एवं व्यायामों का बड़ा महत्व हैं । इनमें जो शारीरिक क्रियाएँ होती है वो शारीरिक अभिवृद्धि की गति बढ़ाती हैं | अतः बालकों को समुचित विकास के लिए किसी न किसी प्रकार का व्यायाम अवश्य करना चाहिए ।
उपरोक्त दशाएँ अभिवृद्धि पर अपना प्रभाव दिखाती हैं ।
स्वमूल्यांकन प्रश्न 1. अभिवृद्धि से आप क्या समझते है। | 2. बालक की अभिवृद्धि को प्रभावित करने वाली दशाएँ कौनसी है।
2.5 विकास का अर्थ
विकास का अभिप्राय बढ़ना नही है । विकास का अर्थ परिवर्तन हैं परिवर्तन इस बात पर आधारित होता है कि वह किस प्रकार क्रम का निर्धारण करता हैं ।

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