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कोठारी आयोग के शिक्षा के सम्बन्ध में दिये गये सुझावों के सम्बन्ध में विचारकों के दो मत सामने आये । एक मत के अनुसार आयोग ने शिक्षा के संबंध में महत्वपूर्ण एवं उपयोगी सुझाव दिये, जिनको लागू करने पर शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन होंगे । आयोग ने शिक्षकों के वेतन वृद्धि का सुझाव दिया, शिक्षा की नवीन योजना प्रस्तुत की और शिक्षा को जीवन से संबंधित करने पर बल दिया । आयोग ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को उत्पादन के साथ जोड़ने पर बल दिया । भाषा की समस्या का समाधान प्रस्तुत किया, स्त्री शिक्षा एवं वयस्क शिक्षा के प्रसार के लिए अनेक सुझाव दिये । शिक्षा के व्यावसायीकरण पर बल दिया, कृषि के आधुनिकीकरण का सुझाव दिया । शैक्षिक अवसरों की समानता के लिए पड़ोसी विद्यालय एवं समान स्कूल प्रणाली (Common School System) को अपनाने का सुझाव दिया । आयोग ने विश्वविद्यालयों व कॉलेजों को अधिकाधिक सम्प्रभु बनाने तथा उच्च शिक्षा में अनावश्यक भीड़ को रोकने के लिए योग्य व प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को ही इसमें प्रवेश का सुझाव दिया । यदि इन सुझावों को पूरी तरह से लागू किया जाता है तो इनका लाभ छात्रों, शिक्षकों, समाज एवं राष्ट्र सभी को मिलेगा । तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने कोठारी आयोग की सिफारिशों को शिक्षकों का मताधिकार पत्र कहा है ।
दूसरे मत के विचारकों का मत था कि राधाकृष्णन आयोग और मुदालियर शिक्षा आयोग के बाद इस आयोग की आवश्यकता नहीं थी तथा आयोग के सुझावों को भी अधिक महत्वपूर्ण माना । आयोग ने शिक्षकों की सुरक्षा की चिन्ता नहीं की, साथ ही आयोग की सिफारिशों के प्रति विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने भी असन्तोष व्यक्त किया । आयोग ने हिन्दी भाषा पर भी कुठाराघात किया है । हिंदुस्तान टाइम्स ने अपने अंक में लिखा – “त्रिभाषा सूत्र के अन्तर्गत शिक्षा आयोग ने अंग्रेजी और हिन्दी के अध्ययन को वैकल्पिक रखा है । यह सुझाव अंग्रेजी के पक्ष और हिन्दी के विपक्ष में है । इस समय उच्च भारतीय नौकरियों के लिए जो परीक्षाएं ली जाती है उसका माध्यम अंग्रेजी है अत: कोई भी छात्र अंग्रेजी की अवहेलना नहीं कर सकता है । हिन्दी राजभाषा तभी बन सकती है जब उसे सम्पूर्ण देश के स्कूलों में अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाने का प्रयास किया जाये।”
अन्त में निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि कुछ सुझावों को छोड़कर आयोग के अधिकांश सुझाव भारत में शैक्षिक विकास की दृष्टि से अत्यन्त लाभदायक है, इन्हें क्रियान्वित करने का लाभ निःसन्देह राष्ट्र को होगा | 16.5 सारांश आयोग की स्थापना – 14 जुलाई, 1964 अध्यक्ष – प्रो0 डॉ. एस. कोठारी (अध्यक्ष, यू.जी.सी.) प्रमुख सिफारिशे
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(ii)
(i) राष्ट्रीय उद्देश्यों की प्राप्ति के लिये शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन, शिक्षा के ढांचे का
पुनर्गठन, शिक्षकों की स्थिति में सुधार, शिक्षा संस्थानों में छात्रों को प्रवेश देने की नीतियां एवं शैक्षिक अवसरों की समानता ।। विद्यालयी शिक्षा प्रसार की समस्यायें, विद्यालयी पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियां, निर्देशन व मूल्यांकन, प्रशासन एवं निरीक्षण, उच्च शिक्षा के लक्ष्य, सुधार, नामांकन एवं कार्यक्रम, विश्वविद्यालयों का अभिशासन, कृषि, व्यावसायिक, प्राविधिक, विज्ञान,
इंजीनियरिंग की शिक्षा, अनुसंधान तथा वयस्क शिक्षा में सुधार । (iii) शिक्षा का नियोजन एवं प्रशासन, वित्तीय व्यवस्था संबंधी अनेक सुझाव । मूल्यांकन- विचारकों के दो मत ।
1. प्रथम मत के अनुसार इन सुझावों के द्वारा शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन सम्भव । 2. दूसरे मत के अनुसार आयोग के सुझावों में हिन्दी पर कुठाराघात सहित अन्य कमियां।
16.6 मूल्यांकन प्रश्न
1. कोठारी शिक्षा आयोग का गठन किन चरणों से होकर गुजरा ? 2. कोठारी शिक्षा आयोग के अनुसार शिक्षा के राष्ट्रीय लक्ष्य क्या है ? 3. कोठारी शिक्षा आयोग के अनुसार शिक्षा की प्रणाली, संरचना व शिक्षक की स्थिति का
वर्णन करें । 4. पाठ्यक्रम के विकास में कोठारी शिक्षा आयोग की संस्तुतियों को स्पष्ट करें । 5. उच्च शिक्षा एवं व्यावसायिक शिक्षा में आयोग की भूमिका स्पष्ट करें ।
6. कोठारी शिक्षा आयोग शिक्षा के मानदण्डों को किस प्रकार विवेचन करता है ? 16.7 सन्दर्भ ग्रन्थ
1. भटनागर, सुरेश (2005) – कोठारी कमीशन (1964-66) आर. लाल बुक डिपो, मेरठ 2. सुखिया, एस. पी. (2000) -विद्यालय प्रशासन, विनोद पुस्तक मंदिर, आगरा 3. वर्मा, जे. पी. (2001) – शैक्षिक प्रबन्धन, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर 4. ओड, एल. के., वर्मा, जे. पी. (1991) शैक्षिक प्रकाशन, राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ
अकादमी, जयपुर. 5. Agrawal J.C. (1967) supervisory practices, Educational
Administration, New Delhi, Agra Book Depot?
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इकाई 17 राष्ट्रीय शिक्षा नीति-1 986 एवं क्रियान्वयन कार्यक्रम-1992
(National Education policy-1986& POA- 1992) इकाई की रूपरेखा 17.0 उद्देश्य 17.1 भूमिका 17.2 शिक्षा नीति की आवश्यकता व गठन 17.3 शिक्षा नीति के मुख्य भाग
17.3.1 प्रस्तावना 17.3.2 शिक्षा का सार तथा ‘भूमिका 17.3.3 शिक्षा की राष्ट्रीय प्रणाली 17.3.4 समानता के लिए शिक्षा 17.3.5 विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक पुनर्गठन 17.3.6 तकनीकी तथा प्रबन्ध शिक्षा 17.3.7 शिक्षा प्रणाली का क्रियान्वयन 17.3.8 शिक्षा के पाठ्यक्रम तथा प्रक्रिया का अभिनवीकरण 17.3.9 अध्यापक 17.3.10 शिक्षा का प्रबन्ध 17.3.11 संसाधन तथा समीक्षा
17.3.12 भावी स्वरूप 17.4 राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) का मूल्यांकन 17.5 संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं क्रियान्वयन कार्यक्रम, 1992 17.6 राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रियान्वयन: वर्तमान भारतीय शिक्षा की स्थिति 17.7 मूल्यांकन प्रश्न 17.8 संदर्भ ग्रंथ
17.0 उद्देश्य
इस इकाई पढ़ने के उपरान्त आप – • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) के उद्देश्य व आवश्यकता के बारे में जानकारी प्राप्त कर
सकेंगे।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) के मुख्य पक्षों के बारे में जान सकेंगे । • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) के मुख्य बिन्दुओं को सकेंगे ।
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राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) की समीक्षात्मक व्याख्या सकेंगे । • वर्तमान शिक्षा नीति के परिप्रेक्ष्य में नई शिक्षा नीति की सार्थकता को समझ सकेंगे । • राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संशोधित प्रारूप, परिचय, गठन व प्रतिवेदन के बारे में
विस्तारपूर्वक अध्ययन कराना । । • राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियात्मक कार्यक्रम का मूल्यांकन कर सकेंगे । 17.1 भूमिका
शिक्षा राष्ट्रीय नीति का एक आवश्यक उपकरण है | राष्ट्र की नीति के विकास में शिक्षा महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है । भारत की राष्ट्रीय नीतियों के निर्धारण में शिक्षा किन दिशाओं में आयोजित हो, यह भी एक विचारणीय प्रश्न रहा है । भारत की स्वतंत्रता के साथ ही जनतंत्र की पृष्ठभूमि पर शैक्षिक उद्देश्यों के विस्तार को व्यक्त करने का विचार प्रारम्भ में ही मुदालियर आयोग ने दे दिया था । आधुनिकीकरण को प्रभावित करने के सबल साधन के रूप में शिक्षा प्ररेणास्त्रोत साबित हुई । विज्ञान व तकनीकी जनकल्याण, विश्वबन्धुत्व की भावना का विकास करना भी हमारी शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए | इन घोषणाओं के साथ जुलाई 1968 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का प्रारम्भ हुआ और इसे स्वतंत्र भारत की प्रथम शिक्षा नीति कहा गया। कोठारी शिक्षा आयोग ने अपने प्रतिवेदन में एक राष्ट्रीय नीति की घोषणा की आवश्यकता बतायी थी । प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति के निम्न बिन्दु थे –
1. निःशुल्क व अनिवार्य शिक्षा 2. भाषाओं का विकास 3. शिक्षकों की स्थिति, वेतन व शिक्षा 4. पुस्तकों का उत्पादन 5. शैक्षिक अवसरों की समानता 6. कृषि और उद्योग की शिक्षा 7. माध्यमिक शिक्षा 8. अंशकालीन शिक्षा व पत्राचार पाठ्यक्रम 9. विश्वविद्यालयी शिक्षा 10. अल्पसंख्यकों की संख्या 11. कार्यानुभव व राष्ट्रीय सेवा 12. साक्षरता व प्रौढ़ शिक्षा का प्रसार आदि ।

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