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अन्तिम उपलब्धि होगी । 4 शिक्षण प्रशिक्षण तथा पाठ्यवस्तु का प्रणना अधिक कुशलता तथा सावधानी से किया
जायेगा, ऐसा करके ही हम व्यक्ति वस्तु तथा समय की बर्बादी को भविष्य में रोक सकेंगे । टेक्नोलोजी तथा इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में हुई क्रान्ति के फलस्वरूप भावी समाज की शिक्षा में निम्नांकित बातों पर प्रभाव पड़ेगा। (i) वीडियो, टेपरिकॉर्डर माइक्रोचिप तथा माइक्रोकम्प्यूटर का प्रयोग अधिक बढ़ेगा । (ii) कागज व पेंसिल की आवश्यकता धीरे-धीरे कम होती जायेगी । (ii) कम्प्यूटर साक्षरता का राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम बनाना आवश्यक होगा । (iv) पाठ्य-पुस्तकों पर निर्भरता कम होती जायेगी । (v) सुनने, देखने, छायांकन करने, चित्र भाषा का अर्थ समझने आदि के कौशलों में
छात्रों को प्रशिक्षित करना अनिवार्य होगा ।
अतः हम कह सकते हैं कि भावी दिशा का आधार ज्ञान न होकर ज्ञान-प्राप्ति की सतत् परिवर्तनशील प्रक्रिया होगी । जिससे भावी समाज सीखने वालों के समाज में बदला जा सकेगा ।
यदि बोर्डों और विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं में नकलबाजी, धांधली पूर्वक उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन, तृतीय श्रेणी व असफल छात्रों के अनुपात की अधिकता परीक्षकों की नियुक्तियों में राग-द्वेष आदि चलता रहेगा तो फिर हमारी भविष्य की शिक्षा भी चौपट हो ही जायेगी । तुरंत अभी से हमे इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे ।। 9 भविष्य की शिक्षा को सभी वर्गों, आयुसमूहो, लिंगों, क्षेत्रों के लिए कार्य करता है ।
अतः वह बहुत विविधता वाली प्रभावशाली हो । हमारे पाठ्यक्रमों में विविधता व
उपयोगिता के तत्वों का बहुत अधिक विकास होगा । 10 भविष्य की शिक्षा को मूलतः सही प्रकार के मूल्यों की शिक्षा का होना आवश्यक है ।
| इसके लिए समुचित व्यवस्थित ढंग से विशाल पैमाने पर व्यवस्थाएं करनी होगी । 10.12 शिक्षा का एकीकृत विचार
शिक्षा मनुष्य सर्वागीण विकास करता है । यह विचार सैद्धान्तिक दृष्टि से सभी दर्शनों में है । मनुष्य एक स्थान पर ज्ञान से सम्बन्धित है तो कहीं पर अवबोध से सम्बन्धित है । शिक्षा के भविष्य को विकल्पों की विविधता के रूप में देखा जा सकता है तथा इन्हीं विकल्पों
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को शिक्षा के उद्देश्यों की संज्ञा दी जा सकती है । शिक्षा के उद्देश्य अर्थात् विकल्पों का निर्धारण केवल वर्तमान के परिष्कार का ही नहीं अपितु भविष्य को आकार देने का. है । परिवर्तित समय में परिप्रेक्ष्य में उद्देश्यों का निर्धारण नीतियां तथा योजना बनाने व उनको कार्यान्वित करने का महत्वपूर्ण साधन है, परम्परागत रूप से शिक्षा का प्रभाव शिक्षा के उत्पाद के रूप में शिक्षित व्यक्ति ही रहा । 10.13 शिक्षा एक मुक्त प्रणाली
भविष्य की शिक्षा हेतु अधिगम शक्ति के रूप में शान के क्षेत्र शिक्षा और कार्य में संबंध तथा सबके लिये शिक्षा है ।।
1 औपचारिक शिक्षा की अवधि का विस्तार करना होगा । 2 शैक्षिक संस्थाओं में नियमित रूप से बढ़कर उत्तीर्ण होने वाले प्रौढों को शिक्षा की
निरन्तरता को बनाये रखना होगा । 3 शिक्षा के एक स्तर से दूसरे का स्वरूप बदलना होगा । 4 शैक्षिक विधियों में आधुनिकता लानी होगी ।
5 अधिगम सम्बन्धी विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति करनी होगी । 10.14 व्यापक अधिगम
बालक के सर्वांगीण विकास के लिये भविष्य विज्ञान व्यापक अधिगम पर बल देता है | अधिगम के प्रथम स्तर पर वैयक्तिक, शारीरिक व स्वास्थ्य के विकास तथा अधिगम सम्बन्धी मूलभूत कौशलों का विकास किया जायेगा । जानने के तरीकों में मानवीकी और सृजनात्मकता, विज्ञान और टेक्नोलॉजी, सामाजिक, आर्थिक ज्ञान को प्रमुखता प्रदान करना भविष्य विज्ञान के दवारा ही संभव है ।। 10.15 विज्ञान व सूचना टेक्नोलोजी का भविष्य समाज पर
प्रभाव आधारित शिक्षा
भविष्य विज्ञान व शिक्षा का अटूट संबंध है । विज्ञान व सूचना टेक्नोलोजी के बिना शिक्षा की कल्पना भविष्यमिति के संदर्भ में करना असम्भव है ।।
सूचना प्राप्ति, प्रश्न कौशल तथा आलोचनात्मक अभिवृत्ति दोनों सम्पूर्ण अधिगम की प्रक्रिया में निहित है, विषेशता: विज्ञान और टेक्नोलोजी शिक्षा का मूल आधार ही है । विज्ञान और टेक्नोलोजी शिक्षा का ध्येय ही विदयार्थियों को स्वयं समस्या की पहचान से सक्षम बनाता है ।
शिक्षा में सतत शिक्षा में मांग एक नवाचार ‘ ‘दूरस्थ शिक्षा ‘ का आह्वान कर रही है, जिसको दूरस्थ अधिगम की संज्ञा भी दी जा सकती है । शैक्षिक टेक्नोलोजी का व्यवहृत रूप के साथ दूरस्थ शिक्षा का सम्बद्ध किया जा सकता है ।
आज के मानव जीवन पर सूचना टेक्नोलोजी का अपरिहार्य प्रभाव है । अधिगम की दृष्टि से मनुष्य की मनुष्य से अन्तःक्रिया की अपेक्षा मनुष्य की मनुष्य से अन्तःक्रिया अधिक प्रभावी हो रही है । सूचना टेक्नोलोजी में नये विकास अर्थात् कम्प्यूटर की सहायता से सीखना,
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परस्पर अन्तःक्रिया वीडियो तथा टेलीवीजन विदयार्थियों को अपने अधिगम को सुधारने के पर्याप्त अवसर प्रदान करते हैं । 10.16 जीवन मूल्य शिक्षा पर बल
भविष्योन्मुखी शिक्षा का प्रमुख तत्व राष्ट्रीय स्तर पर योजना व विकास निर्माण है । विद्यार्थियों में मूल्य शिक्षा के संवर्धन व विकास के लिये भविष्य शिक्षा का सहारा लिया जाना आवश्यक है । भविष्य शिक्षा न केवल कम्प्यूटर व सूचना क्रान्ति तक ही सीमित है, बल्कि इसके माध्यम से बालकों में बेहतर जीवन जीने की कला का भी विकास होता है । जीवन मूल्यों का शिक्षा प्रणाली में प्रवेश परिवार के माध्यम से ही हो सकता है । विद्यालय में बालक की आदतों का निर्माण सम्भव हो सकता है । भविष्य का भारतीय समाज कैसा होगा?
आपको यह याद रखना चाहिये कि यद्यपि भविष्य में कई घटनाएँ अप्रत्याशित या अचानक रूप से हो सकती हैं, तथापि यह मानना ही तर्कसंगत होगा कि हमारा भविष्य बहुत कुछ वैसा ही होगा जैसा कि हमारे आज के वर्तमान में हो रहा है । और जो सम्मिलित प्रभाव के रूप में हमारे सामने आयेगा ।
यदि आपसे ही पूछा जाये कि बतलाइये कि आज के समकालीन भारत की मूलभूत वास्तविकता क्या हैं तो क्या आप गरीबी, बेकारी, भ्रष्टाचार, मानवमूल्यों का घोर पतन, ढोंगीपन वर्गभेदो का बढ़ना, घन लिप्सा की घोर अभिवृद्धि, थोथी नारेबाजी, सामाजिक जीवन में बढ़ती हुई अलगाव की भावना, सांस्कृतिक जीवन में भयंकर संकट, राजनैतिक जीवन में आदर्शों की मजाक, ओर बढ़ती हुई हिंसा, आतंकवाद, यौन-अनाचार और स्वार्थीपन की प्रवृतियों का उल्लेख किये बिना रह सकते हैं ।
कई समाजशास्त्रियों तथा अन्य सामाजिक वैज्ञानिकों ने भी वर्तमान भारत की इन्हीं परिवर्तन संबंधी विशेषताओं का उल्लेख अपनी शोधो तथा अवलोकनो के आधार पर किया है । दाहरणार्थ, एम.एन,श्रीनिवास (M.N.Srinivas) ने भारतीय मध्यम वर्ग में देश के प्रति बढ़ती हुई अनास्था (loss of faith ), अतार्किकता तथा उग्रवादी झगडालू प्रवृत्तियों का उल्लेख किया है ।

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