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लिए प्रेरित कर सके।
8. अनिवार्य शिक्षा तथा निःशुल्क शिक्षा द्वारा तीव्र शिक्षा का प्रसार-प्रचार करना होगा । 9.8 सारांश
शिक्षा वह प्रकाश है जिसके द्वारा बालक की समस्त शारीरिक, मानसिक, सामाजिक शक्तियों का विकास होता है । व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन के लिए शिक्षा परम आवश्यक है।
मानव समाज की संरचना व्यवस्था तथा संबंधों में होने वाला कोई भी परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन है । समाज के अंगों में सामाजिक संरचना का निर्माण करने वाले सभी तत्व आते है । समाज शब्द का प्रयोग मानव समाज के लिए ही किया जाता है |
एक ओर शिक्षा आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित करती है, तो दूसरी ओर आर्थिक परिस्थितियों में बदलाव शैक्षणिक व्यवस्था में परिवर्तन करता है । शिक्षा मानव संसाधन को कुशलता व विवेकशीलता प्रदान करती है । शिक्षा विज्ञान तथा प्रोद्यौगिकी के समुचित उपयोग के लिए मानव को तैयार करती है और मानव विकास उभरते हुए भारतीय समाज में स्पष्ट देखा जा सकता है ।
आज तीव्र गति से ज्ञान का विस्फोट हो रहा है, उससे मुकाबला करने के लिए विद्यालय के पास पर्याप्त साधन नही है । बालक व शिक्षक को उदीयमान भारत का सपना पूरा करने के लिए शिक्षा में नवाचार का प्रयोग करना होगा । अतः शिक्षा ही वह साधन है। जिसके माध्यम से उदीयमान भारत का विकास संभव है ।
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9.9 मूल्यांकन प्रश्न
1 शिक्षा के संकुचित तथा व्यापक अर्थ को समझाइये ।। 2 शिक्षा से आप क्या समझते है? इसकी प्रकृति एवं महत्व बताइये । 3 मानव जीवन में शिक्षा की भूमिका की विवेचना कीजिए । 4 भारतीय समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बताइये ।। 5 सामाजिक व्यवस्था के निर्माण में शिक्षा की भूमिका की विवेचना कीजिए ।
6 उभरते हुए भारतीय समाज की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए । 9.10 संदर्भ ग्रन्थ सूची 1. ओड एल. के.
: शिक्षा की दार्शनिक पृष्ठभूमि
:
2. पारखी मथुरेश्वर, शर्मा रजनी 3. अग्रवाल एस. के. 4. सक्सेना एन. आर. स्वरूप
उदयीमान भारतीय समाज तथा शिक्षा शिक्षा के तात्विक सिद्धान्त शिक्षा के दार्शनिक एवं समाजशास्त्रीय सिद्धान्त
5. वर्मा रामपाल सिंह, सूद जे. के. : 6. शर्मा डी. एल. 7. त्यागी जी. एस. डी., पाठक पी. :
उदीयमान भारतीय समाज शिक्षा तथा भारतीय समाज भारतीय शिक्षा की समसामायिक समस्याएँ
डी.
:
उदीयमान भारतीय समाज में शिक्षा
8. सक्सेना एन. आर. स्वरूप चतुर्वेद शिखा
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इकाई – 10 शिक्षा और भविष्य का भारतीय समाज
इकाई की रूपरेखा 10.0 उद्देश्य 10.1 प्रस्तावना 10.2 भविष्य शास्त्रः अर्थ 10.3 शिक्षा और भविष्यशास्त्र 10.4 शिक्षा की भविष्यमिति का अर्थ 10.5 भविष्य शास्त्र के क्षेत्र 10.6 भविष्य शास्त्र की आवश्यकता व महत्व 10.7 भविष्य शिक्षा के आधारभूत सिद्धान्त 10.8 भविष्य शिक्षा के उद्देश्य 10.9 भविष्य शिक्षा की विषय सामग्री तथा शिक्षा प्रक्रिया 10.10 भविष्य शिक्षा के स्तर (स्मअमसे), प्रशासन तथा अर्थ 10.11 शिक्षा के संदर्भ में भविष्य की संभावनायें व भारतीय समाज का परिदृश्य 10.12 शिक्षा का एकीकृत विचार 10.13 शिक्षा एक मुक्त प्रणाली 10.14 व्यापक अधिगम 10.15 विज्ञान व सूचना टेक्नोलोजी का भविष्य समाज पर प्रभाव आधारित शिक्षा 10.16 जीवन मूल्य शिक्षा पर बल 10.17 भावी भारत में विद्यालय 10.18 मूल्यांकन प्रश्न । 10.19 संदर्भ ग्रन्थ 10.0 उद्देश्य
• विद्यार्थी भविष्य विज्ञान के अर्थ व क्षेत्र का ज्ञान कर सकेंगे ।
विदयार्थी भविष्य विज्ञान की आवश्यकता व महत्व के बारे में प्रवीणता प्राप्त कर
सकेंगे। • शिक्षा व भारतीय समाज के भविष्य शास्त्र के सिद्धान्तों व उद्देश्यों का ज्ञान कर सकेंगे
10.1 प्रस्तावना
मानव सदैव अपने भविष्य के लिये चिन्तित रहा है । उन्होंने इसके लिये अनेकानेक योजनायें बनाई है । पश्चिम के आधुनिक समाजों में आज भविष्य के प्रति चिन्ता और तेजी से बढ़ती जा रही हैं । इसके मूल में तेज़ी से बदलता हुआ विज्ञान एवं शिल्पविज्ञान आधारित समाज है, द्रुत गति से आ रहे जीवन के विभिन्न क्षेत्र में परिवर्तन -हैं । मनुष्य सदैव से ही
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अपने भविष्य को जानने को उत्सुक रहा है । ज्योतिष में उसकी आस्था इसी की परिचायक है । उसकी भविष्यवाणियों के आधार पर अपने भविष्य के कार्यकलापों व कार्य योजनाओं का निर्धारण करता है । किसी भी देश, राज्य, समुदाय, परिवार का वर्तमान व भविष्य शिक्षा प्रणाली के संगठन एवं नियोजन पर निर्भर करता है । शिक्षा का स्वरूप जैसा होगा, भारतीय समाज का स्वरूप भी वैसा ही होगा | भूमण्डलीकरण व वैश्वीकरण के इस युग में परिवर्तन तीव्र गति से आ रहे हैं । शिक्षा के कारण विकार। के मार्ग में होने वाले परिवर्तन भारतीय समाज की व्यवस्था को निर्धारित करते है ।
10.2 भविष्य शास्त्रः अर्थ
भविष्य शास्त्र का शाब्दिक अर्थ हैं भविष्य का विज्ञान या भविष्य का अध्ययन (Science or study of future) यह एक ऐसी अनवरत प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम स्वयं को आस-पास की भावी अच्छी या बुरी वास्तविकताओं के प्रति सचेत करते हैं और उसी के आधार पर योजनाएँ बनाते हैं ।
इस शास्त्र में सर्वाधिक बल भविष्य को समझ कर उसके स्पष्ट अंकन पर है । भावी तादात्मय, भविष्य दृष्टा, भविष्य चेतना, भविष्योन्मुखी आदि भविष्यशास्त्र की शब्दावलियाँ है । भविष्यशास्त्र भविष्य के विकल्पों के क्षेत्र को समृद्ध करने व संभावनाओं के अधिक विस्तृत स्वरूप का चित्रित करने का प्रयास करता है । हैक्सले व येट्स के अनुसार :- “भविष्य के वैज्ञानिक अध्ययन को उस व्यवस्थित प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो प्रवृत्तियों व विकल्पों को पहचान कर भविष्य के विचारणीय विषयों की ओर संकेत करती है ।। (The scientific study the future may be defined as a systematic process for identifying terends and alternatives that point issues of future)
-By Hensly and Yatyes जे.एल.बुर्डिन (J.L.Burdin) के अनुसार – “भविष्यमिति प्रदोपित परिवर्तनों के अध्ययन एवं उनके प्रति प्रतिक्रियाओं की प्रक्रिया है ।” (Futurism is a process for studying and wacting to projected changes) सारांशतः कहा जा सकता है कि ।
1. भविष्य का वैज्ञानिक अध्ययन एक व्यवस्थित प्रक्रिया है । 2. भविष्य विज्ञान के दवारा सम्भावित परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है । 3. यह एक विकासशील विज्ञान है ।। 4. यह एक अन्तर्विषयी अध्ययन क्षेत्र है।
5. इसके द्वारा समाज के उद्देश्यों व मूल्यों का सम्यक् मूल्यांकन किया भविष्यों के प्रकार भविष्य तीन प्रकार के होते सकते है । 1 संभावित भविष्य 2 निश्चितापूर्ण (संभावित भविष्य) 3 अभीप्सित या पसंद किए हुए भविष्य
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10.3 शिक्षा और भविष्यशास्त्र
भविष्य विज्ञान का महत्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है । शिक्षा में भी इसका प्रयोग हो रहा है । शिक्षा के क्षेत्र में इसके प्रयोग ने शिक्षा की भविष्यमिति (Futurology of education) या ‘शैक्षिक भविष्यमिति (Educational Futurology) को जन्म दिया है ।

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