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6. संघीय भाषा के लिए केवल देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाए और इस लिपि के
दोषों को दूर किया जाए । 7. राज्य सरकारों द्वारा उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों, डिग्री कॉलेजों और विश्वविद्यालयों
की संघीय भाषा की व्यवस्था की जाए । 8. वैज्ञानिक और भाषा विशेषज्ञों की एक समिति बनाई जाये जो वैज्ञानिक शब्द कोष
बनाए । आयोग ने संघीय भाषा में अन्य स्त्रोतों से आए हुए शब्दों के समन्वय के बारे में सुझाव दिए । आयोग ने शिक्षा के माध्यम के रूप में भारतीय भाषाओं और संघीय भाषा का पक्ष लिया, जो बिल्कुल उचित था । उसका यह सुझाव भी प्रशंसनीय है कि इन भाषाओं को जल्दी से जल्दी विकसित किया जाए | लेकिन साथ ही आयोग ने
अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में स्थान रखने के लिए अंग्रेजी का भी समर्थन किया । 14.8.8 परीक्षाएँ
आयोग ने परीक्षाओं में सुधार के निम्न सुझाव दिए1. शिक्षा मंत्रालय और विश्वविद्यालयों में परीक्षा लेने की वैज्ञानिक पद्धतियों का सूक्ष्म
अध्ययन किया जाए और अध्ययन के परिणामों को परीक्षा पद्धति में क्रियान्वित
करके, उनमें सुधार किया जाए । 2. शिक्षा-मंत्रालय द्वारा एक या दो ऐसे विशेषज्ञों की नियुक्ति की जाए, जो वस्तुगत
परीक्षाओं के निर्माण, प्रयोग, प्रक्रियाओं और सिद्धान्तों में कुशल हैं । इनके द्वारा
विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केन्द्रों को परामर्श और सहायता दी जाए । 3. उच्चतर माध्यमिक स्कूलों के छात्रों के लिए मनोवैज्ञानिक और योग्यता-परीक्षाओं का संग्रह विकसित किया जाए । इसका प्रयोग 12 वर्ष की विद्यालय शिक्षा के अन्त में
और प्रथम डिग्री कोर्स प्रवेश चाहने वाले छात्रों के लिए किया जाए । 4. सरकारी नौकरियों के लिए विश्वविद्यालय की डिग्री को आवश्यक न माना जाए । सेवा
आयोग द्वारा थोड़ा सा शुल्क लेकर परीक्षाओं की व्यवस्था की जाए और उनमें उत्तीर्ण होने वाले छात्रों में से चुनाव किया जाए । 5. प्रथम डिग्री की अवधि 3 वर्ष रखनी चाहिए और प्रत्येक वर्ष के अन्त में स्वत: पूर्ण
इकाइयों में परीक्षा ली जाए । 6. परीक्षाओं के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणियों के लिए
न्यूनतम अंक क्रमश: 70 या अधिक, 55 और 40 प्रतिशत रखे जाएँ । 7. मौखिक परीक्षाएँ केवल स्नातकोत्तर और व्यावसायिक उपाधियों के लिए ही प्रयुक्त
होनी चाहिए । आयोग ने यह स्वीकार किया कि हमारी परीक्षा प्रणाली में अनेक प्रकार के दोष है । यदि आयोग के उपर्युक्त सुझावों को अपना लिया जाए तो निश्चित रूप से हमारी परीक्षा प्रणाली में सुधार हो जायेगा ।
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14.8.9 छात्र क्रियाएँ एवं कल्याण
आयोग ने छात्रों, उनकी क्रियाओं और कल्याण हेतु निम्नलिखित सिफारिशें प्रस्तुत की
(अ) छात्रों का चयन 1. विश्वविदयालयों और कॉलेजों में छात्रों को बिना किसी भेदभाव के केवल योग्यता के
आधार पर प्रवेश दिया जाए । 2. प्रथम डिग्री स्तर पर स्थानीय छात्रों को सुयोग्य बनाने के लिए विविध प्रकार के
पाठ्यक्रम प्रदान किये जाने चाहिए ।, 3. स्नातकोत्तर, व्यावसायिक और उन्नत अनुसंधान स्तरों पर विश्वविद्यालयों की अपनी
क्रियाओं को संकेन्द्रित और समन्वित करना चाहिए । (ब) छात्रवृति परीक्षाएँ
छात्रवृति प्रदान करने का आधार परीक्षा होना चाहिए और छात्रवृतियां केवल योग्य और निर्धन छात्रों को दी जाएँ । (स) स्वास्थ्य 1. प्रवेश के समय और उसके बाद वर्ष में कम से कम एक बार प्रत्येक छात्र और छात्रा
की निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षा की जाएँ । 2. प्रत्येक विश्वविद्यालय में छात्रों की चिकित्सा के लिए चिकित्सालय होना चाहिए, भले
ही उससे सम्बद्ध मेडिकल कॉलेज क्यों न हो । 3. संक्रामक रोगों के पीड़ित छात्रों को विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों में प्रवेश न दिया
जाए | 4. दोपहर के समय उचित मूल्य पर छात्रों को पौष्टिक भोजन दिया जाए । 5. सभी छात्रों को चेचक, हैजा, टाइफाइड और प्लेग के टीके लगायें जाए । 6. शारीरिक शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए व्यायमशालाओं, खेल के मैदान और उपकरणों की
व्यवस्था आवश्यक है । (द) एन.सी.सी । | 1. सभी शिक्षा संस्थाओं में एन.सी.सी. की व्यवस्था की जाए । 2. एन.सी.सी. का प्रशासन राज्य सरकारों द्वारा न किया जाकर केन्द्रीय सरकार द्वारा
किया जाना चाहिए । 3. विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में एन.सी.सी. का प्रशिक्षण देने के लिए थल, नभ, जल
सेवाओं के अफसरों को नियुक्त किया जाए ।
छात्रावास और आवास 1. महाविद्यालयों को सम्बद्ध करते समय इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाए की उनके
छात्रावास उचित ढंग के हैं, या नहीं । 2. वर्तमान साम्प्रदायिक छात्रावासों को समाप्त कर दिया जाए और सार्वभौमिक छात्रावासों
की स्थापना की जाए ।
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3. छात्रावासों का निर्माण खण्डों में किया जाना चाहिए | प्रत्येक खण्ड में 50 छात्रों से
अधिक न रखे जाए ।
विश्वविद्यालय छात्र संघ | 1. विश्वविद्यालयों के छात्रों को राजनैतिक क्रियाओं से यथासम्भव अलग रखा जाए । 2. संघ छात्रों की सामूहिक क्रियाओं के मुख्य केन्द्र और सभी छात्र संगठनों की संघीय
कड़ी होनी चाहिए । (ल) अनुशासन 1. छात्रों को अच्छे शासन में रूचि लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए किन्तु
दलगत राजनीति में नहीं । 2. शिक्षक अभिभावक, राजनैतिक नेता, जनता. समाचार पत्र सब मिल जुलकर इस प्रकार
कार्य करें की छात्रों में उचित प्रकार के जीवन का विकास हो । (व) छात्र-कल्याण | 1. महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में छात्र अधिष्ठाता का कार्यालय स्थापित किया
जाए। 2. विश्वविद्यालयों में छात्र-कल्याण सलाहकार परिषद की व्यवस्था की जानी चाहिए ।
छात्रों से सम्बन्धित सभी बातों पर आयोग ने अति प्रशंसनीय सुझाव दिये । उससे छात्र- जीवन का कोई भी अंग अछूता नहीं छोड़ा, पर खेद है कि सरकार ने उसके सुझावों पर बहुत कम ध्यान दिया । छात्रों के लिए न तो पौष्टिक योजना की व्यवस्था की और न ही उनके स्वास्थ्य की देखरेख के लिए सरकार ने ‘राष्ट्रीय स्वस्थ्य कोर’ की स्थापना की । इसके अलावा आयोग ने एन.सी.सी. अनुशासन, विश्वविद्यालय संघ और छात्रावास व छात्र कल्याण के लिए जो सुझाव दिये उन पर भी सरकार ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है । अगर इन पर पूर्णरूप से ध्यान दिया जाये तो देश की समृद्धि भी होगी और कल्याण भी । 14.8.10 स्त्री शिक्षा
स्त्री शिक्षा के महत्व पर आयोग ने कहा कि शिक्षित स्त्रियों के बिना शिक्षित व्यक्ति नहीं हो सकते । यदि सामान्य शिक्षा पुरूषों अथवा स्त्रियों के लिए सीमित रखी जानी हो, तो यह अवसर स्त्रियों के लिए दिया जाना चाहिए, इससे यह अधिक निश्चितता से आगामी पीढ़ी को हस्तांतरित की जा सकेगी | अत: स्त्री शिक्षा के विकास के लिए आयोग ने निम्नलिखित सुझाव दिये है
1. स्त्रियों को ऐसी शिक्षा दी जाये, जिससे वे सुमाता और अच्छी ग्रहणी बन सके । 2. स्त्रियों की शिक्षा सुविधाओं में विस्तार किया जाना चाहिए । 3. सह-शिक्षा की संस्थाओं में पुरूषों पर स्त्रियों के प्रति शिष्ट व्यवहार और सामाजिक
दायित्वों का निर्वाह करने का भार डाला जाए । 4. समान कार्य के लिए अध्यापिकाओं को उतना ही वेतन दिया जाना चाहिए जितना की
अध्यापकों को दिया जाता है ।

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