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आयोग ने अपने प्रतिवेदन को शिक्षा और राष्ट्रीय प्रगति (Education and National Development) का नाम दिया गया । प्रतिवेदन को तीन भागों में विभक्त किया गया -प्रथम भाग में राष्ट्रीय उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन, शिक्षा के ढांचे का पुनर्सगठन, शिक्षकों की स्थिति में सुधार, शिक्षा संस्थानों में छात्रों को प्रवेश देने की नीतियाँ एवं शैक्षिक अवसरों की समानता जैसे पहलुओं को सम्मिलित किया गया । वितीय भाग में विद्यालय शिक्षा के महत्वपूर्ण अंगों (विस्तार, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियाँ, पाठ्यपुस्तकें, मूल्यांकन, प्रशासन एवं निरीक्षण की समस्याएँ ) उच्च शिक्षा की समस्याएँ (विश्वविद्यालयों की स्थापना, गुणात्मक उन्नति के कार्यक्रम, छात्र संख्या एवं विश्वविद्यालय प्रशासन), कृषि, प्राविधिक एवं व्यावसायिक शिक्षा, विज्ञान की शिक्षा एवं अनुसंधान को सम्मिलित किया गया । तृतीय भाग आयोग के सुझावों को क्रियान्वित करने संबंधी समस्याओं को रखा गया |
। आयोग के द्वारा अपने प्रतिवेदन में शैक्षिक सुधारों के सम्बन्ध में दिये गये सुझावों को यही बिन्दुवार प्रस्तुत किया जा रहा है :16.3.1 शिक्षा एवं राष्ट्रीय लक्ष्य । आयोग ने लिखा है कि इस समय भारत के भाग्य का निर्माण उसके अध्ययन कक्षों में किया जा रहा है । आज के विश्व में विज्ञान एवं टेक्नोलोजी पर आधारित लोगों की समृद्धि, कल्याण और सुरक्षा का स्तर शिक्षा के दवारा निर्धारित किया जाता है | इस दृष्टि से शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायक हो सके । इसके लिए आयोग ने निम्नलिखित सुझाव दिये(i) शिक्षा के द्वारा उत्पादन में वृद्धि के लिये शिक्षा के सभी स्तरों पर विज्ञान की शिक्षा
देना तथा विज्ञान का प्रयोग उत्पादन एवं कृषि कार्यों के लिये करना । कार्यानुभव व
टेक्नोलोजी को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाना । (ii) सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता के लिये आयोग ने समान विद्यालय प्रणाली (Common
School system) को राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में स्वीकार करने, सामाजिक एवं राष्ट्रीय सेवा को सभी छात्रों के लिये अनिवार्य करने, एन.सी.सी. को बढ़ावा देने, मातृभाषा को स्कूल शिक्षा का माध्यम बनाने, अंग्रेजी तथा अन्तर्राष्ट्रीय महत्व की अन्य भाषाओं के अध्ययन पर बल देना ।
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शिक्षा के द्वारा प्रजातंत्र को सुदृढ़ बनाने के लिये 14 वर्ष तक के आयु के बालकों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देना, निरक्षरता का उन्मूलन, माध्यमिक स्तर पर नेतृत्व का प्रशिक्षण, बिना भेदभाव के सभी को शिक्षा के समान अवसर, वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास तथा सहिष्णुता, आत्मानुशासन, आत्मनिर्भरता जैसे गुणों का विकास करना। शिक्षा के द्वारा आधुनिकीकरण के लिए उचित दृष्टिकोण का विकास, स्वतंत्र अध्ययन
तथा विचारों का निर्माण, विज्ञान आधारित टेक्नोलोजी को अपनाना । (v) सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों के विकास के लिए शिक्षा व्यवस्था पर बल
देना ।
इस प्रकार आर्थिक, सामाजिक एवं नैतिक विकास, राष्ट्रीय एकता तथा उत्पादन एवं उत्पादकता वृद्धि जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु आयोग ने महत्वपूर्ण सुझाव दिये, जिनके आधार पर इन लक्ष्यों की प्राप्ति करना सम्भव हो सकता है । 16.3.2 शिक्षा की प्रणाली, संरचना एवं स्तर।
आयोग ने किसी भी शिक्षा प्रणाली के स्तर के लिए शिक्षा प्रणाली के ढांचे का विभिन्न स्तरों में विभाजन और उनका पारस्परिक सम्बन्ध तथा विभिन्न स्तरों की कुल अवधि को महत्वपूर्ण माना है । इसके लिये आयोग ने शिक्षा की निम्न संरचना प्रस्तुत की – (i) विद्यालयी शिक्षा – प्रारम्भिक स्तर (8वर्ष) सामान्य शिक्षा
निम्न माध्यमिक स्तर (2वर्ष)
उच्च माध्यमिक स्तर(2वर्ष)-विशिष्ट एवं व्यावसायिक शिक्षा उच्च शिक्षा –
स्नातक स्तर (3वर्ष)
स्नातकोत्तर स्तर (2वर्ष) – चुने हुए विषयों में (i) आयोग ने उपलब्ध सुविधाओं -पुस्तकालय, प्रयोगशाला आदि के अधिकतम उपयोग पर
बल दिया । साथ ही शैक्षिक सत्र में छुट्टियों की संख्या कम से कम करने का सुझाव
दिया । (ii) आयोग ने शिक्षा के गुणात्मक सुधार पर बल दिया, जिससे अपव्यय को कम से कम
किया जा सके।
इस प्रकार आयोग ने शिक्षा के विभिन्न स्तरों तथा उनकी अवधि निर्धारित कर शिक्षा के स्तरों के उन्नयन का सुझाव दिया, जिसमें सरकारी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है ।। 16.3.3 शिक्षक की स्थिति
आयोग ने अनुभव किया कि शिक्षा व्यवसाय हेतु योग्य एवं प्रतिभाशाली व्यक्तियों को आकर्षित करने के लिए उन्हें आर्थिक, सामाजिक तथा व्यावसायिक दृष्टि से सम्पन्न बनाया जाना आवश्यक है । इस हेतु विभिन्न स्तरों पर शिक्षकों की स्थिति में सुधार लाने के लिये आयोग ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिये हैं :(i) विद्यालय एवं उच्च स्तर के शिक्षकों के लिए न्यूनतम वेतन का स्तर निर्धारण करना
चाहिए । साथ ही सभी विद्यालयों के शिक्षकों के वेतन समान होने चाहिए, चाहे विदयालय सरकारी हो या गैर सरकारी । शिक्षकों की विभिन्न स्तरों पर न्यूनतम
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(iii)
योग्यता निर्धारित होनी चाहिए । माध्यमिक स्तर के अध्यापकों के लिए प्रशिक्षण प्राप्त करना अनिवार्य होना चाहिए । प्रथम श्रेणी से स्नातक अथवा स्नातकोत्तर उत्तीर्ण
शिक्षक या एम.एड. उपाधि धारक शिक्षक को अग्रिम वेतनवृद्धि दी जाये। (i) सभी शिक्षकों को यथासमय, योग्यतानुसार पदोन्नति दी जाये ।
सभी स्तरों के शिक्षकों को सेवानिवृत्ति के लाभ अन्य राजकीय कर्मचारियों के समान मिलने चाहिए। सेवानिवृत्ति की आयु 60 वर्ष रखने तथा विशेष परिस्थितियों में 65
वर्ष तक बढ़ाने का सुझाव दिया। (iv) शिक्षकों की कार्यदशा को सुधारने तथा उनकी कार्यकुशलता बढ़ाने का सुझाव दिया ।
| इसी सन्दर्भ में अध्यापिकाओं को आवास तथा अन्य सुविधाओं का भी सुझाव दिया ।

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